गुरुवार, 1 जनवरी 2009

हमें खुद को बदलना होगा

आज एक जनवरी २००९ बीत गया। कल से हम फिर उसी जिंदगी की जद्दोजहद में भिड़ जायेंगे। रोजमराॆ के कामों में लगे रहते हुए अपने चिड़चिड़ेपन को इस ब्लाग पर उतारते हुए शायद एक अनोखी लड़ाई लड़ेंगे। लेकिन क्या आपने गौर किया है, जब हम दूसरों की गलतियों को देखते हैं, तो इतनी कमजोरियां दिखती हैं कि शायद गिनती भी कम पड़ जाये।
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हमें जीतना होगा खुद से
नये साल में कामों की शुरुआत करते हुए हम व्यक्तिगत स्तर पर कम से कम जीतने की इच्छा जरूर रख सकते हैं। ये सूची तैयार कर सकते हैं कि हममें क्या कमजोरियां हैं और इन्हें दूर करने के लिए हम क्या कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए जिस इच्छाशक्ति की जरूरत होती है, वह इतनी आसानी से मिलनेवाली नहीं। इसके लिए हमें फोकस्ड रहना होगा। अगर हमारी सुरक्षा के लिए जिम्मेदार अधिकारी फोकस्ड या एकाग्र रहते, तो न तो मुंबई पर आतंकी हमले कर पाते और न इतनी जानें जातीं। हमें व्यक्तिगत जीवन में जीतने की अदम्य इच्छा रखनी होगी। व्यक्तिगत स्तर पर मैं ब्लाग शुरू करने से लेकर आज तक के लिए खुद को विजेता के रूप में देखता हूं। क्योंकि लिखने का साथ कुछ सालों से छूटा हुआ था। इसलिए जिस आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है, वह थी नहीं। लेकिन मैंने पूरी ताकत लगा दी। आज कुछ न कुछ हासिल किया हुआ पाता हूं। ब्लाग के सहारे मैंने उन लोगों को जाना, जिन्हें कभी ऐसे जान नहीं पाता। वैसे लोगों को स्नेह और आशीवाॆद मिला, जिन्हें सरस्वती का वरदान हासिल है। साल के अंत में इतना कुछ पाना सचमुच में एक उपलब्धि की तरह है।

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सकारात्मक और संतुलित सोच जरूरी
रोज टीवी चैनलों पर वैसे सीरियलों और कायॆक्रमों की झलक जरूर मिलती है, जिन्हें देखने मात्र से ही नकारात्मक भावनाओं को बल मिलता है। व्यक्तिगत जीवन में भी हम ज्यादातर समय इन्हीं बातों पर जोर देते दिखते हैं। मेरा मानना है कि हम कम से कम सकारात्मक सोच को जीवन में स्थान जरूर दें, जिससे समाज में फैल रही अराजकता को कुछ हद तक जरूर कम कर सकें। शायद यह बोलना उपदेश देने जैसा होगा, लेकिन ये एक जरूरी पहल, जो हम सबको करनी होगी।

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गिरते मनोबल को संभालने की जरूरत
हम अपने आसपास के लोगों के मनोबल को बढ़ाने का काम करें। जिससे उनमें सामाजिकता की भावना का विकास हो। एकल परिवार के दौर में हर कोई एक-दूसरे से कट सा गया। क्या यह बेहतर नहीं हो कि हम लोग कुछ समय दूसरों के लिए निकालें। यह भले ही कुछ देर के लिए संभव नहीं प्रतीत होता हो, लेकिन ये शायद असंभव भी नहीं है।

1 टिप्पणी:

समयचक्र - महेद्र मिश्रा ने कहा…

हम अपने आसपास के लोगों के मनोबल को बढ़ाने का काम करें। जिससे उनमें सामाजिकता की भावना का विकास हो.....
जब हम बदलेंगे तब .....बदलेंगे, .... वाह साब बहुत खूब उम्दा ..