मंगलवार, 18 नवंबर 2008

हिंदी ब्लागरों परिवारवाद का विरोध करो

ब्लॉग जगत को लेकर मंथन का दौर जारी है। एक पुराने वरिष्ठ ब्लागर साथी ने ब्लाग जगत में व्याप्त खेमेबाजी का विस्तार से वणॆन किया। फिर बाद में खुद को एक परिवार विशेष का बताया। लेकिन खुद को एक परिवार से जुड़े होने का बताने से ही यह साफ हो जाता है, वे खुद ही खेमेबाजी के शिकार हैं। और खास परिवार को ही तरजीह देते हैं।

लेकिन सवाल वही, क्या विचारों के प्रवाह को खेमेबाजी में बदला जा सकता है। हो सकता है कि ब्लाग की दुनिया में कई लोगों के विचार एक जैसे हों। कुछ लोग एक-दूसरे का काफी सम्मान भी करते होंगे। उनमें आत्मीयता भी बढ़ी होगी। लेकिन दूसरों के सामने उन सबको परिवार के दायरे में बताना संकुचित मानसिकता की पहचान है। अभिव्यक्ति के मंच पर हम-आप, हमारा-तुम्हारा और मेरा-तेरा जैसे किसी शब्द की कोई जगह नहीं होती है।

जब संविधान बना, तो सबसे ज्यादा अहमियत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दी गयी। अगर आप किसी की आलोचना (गलत आलोचना नहीं, बल्कि सही) को सहन नहीं कर पाते हैं, तो आपको दूसरे की आलोचना करने का भी हक नहीं है। विचारों की दुनिया में आप तभी तक जिंदा रह सकते हैं, जब तक आप दूसरे लोगों के विचारों का सम्मान करते हैं।

जब बौद्धिक जगत के लोग एक साथ जुटेंगे, तो तकॆ-वितकॆ होगा ही। कभी भी एक व्यक्ति के विचार दूसरे से नहीं मिलेंगे। अगर एक ही सिद्धांत के माननेवाले होंगे, तब भी कुछ मुद्दों पर मतभेद होगा ही। ब्लॉग भी लेखनी का एक नया जरिया ही है। कृपया इसे परिवार और खेमों में बांट कर प्रदूषित करने की चेष्टा नहीं हो। यही उचित है। हो सकता है कि कुछ ब्लॉग जगत के पुराने खिलाड़ी हों। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि परिवार और खेमों में बांटकर बहस और विचारों का आदान-प्रदान करने के लिए बनाये गये मंच का माहौल ही खराब कर दिया जाये।

उम्र और अनुभव में कुछ साथियों के बड़े होने के कारण शायद उन्हें यह ठीक नहीं लगे, लेकिन पूरा मामला यही है। ब्लाग जगत को विचारों के समुद्र में गोता लगाने दीजिये। आप भी कम्युनिस्ट और पूंजीवाद विचारों का अध्ययन करें। उनके गुण-दोष जानें और हम सबको बतायें। लेखन एक स्वतंत्र विद्या है। यहां किसी के समथॆक होने या उनके विचारों को सम्मान नहीं देने का कोई सवाल नहीं है। हां असहमत या सहमत होना एक अलग बात है। उम्मीद है कि हमारे विचार से आप भी सहमत होंगे।

17 टिप्‍पणियां:

seema gupta ने कहा…

अभिव्यक्ति के मंच पर हम-आप, हमारा-तुम्हारा और मेरा-तेरा जैसे किसी शब्द की कोई जगह नहीं होती है।
" bilkul shee kha hai aapne"

Regards

अनुनाद सिंह ने कहा…

यदि आप भारतीय राजनीति में परिवारवाद या वंशवाद की तरफ़ इशारा कर रहे हैं तो मैं भी इससे सहमत हूं।

परिवारवाद लोकतन्त्र का मजाक उड़ाता है। देश के सिर पर अयोग्य लोगों को बैठाता है। वंशवाद प्रकारान्तर से गुलामी है। यह प्रकारान्तर से गुलामी का सातत्य (कान्टीन्युएशन) है।

आज के सूचना और बुद्धिवाद के युग में भारत में वंशवाद का जारी रहना भारत के लिये बहुत बड़ा अभिशाप है। देश की युवा पीढ़ी इसे जितना जल्दी इतिहास बना दे, उतना ही अधिक देश का कल्याण होगा।

संगीता पुरी ने कहा…

अभिव्यक्ति के मंच पर हम-आप, हमारा-तुम्हारा और मेरा-तेरा जैसे किसी शब्द की कोई जगह नहीं होती है।
आपकी और सीमा गुप्‍ता दोनो की बातों से ही मैं सहमत हूं

Rachna Singh ने कहा…

aap meri is kavita ko jarur daekhae aap kaa hi vishya maene uthaaya haen aur apna virodh jataaya haen
ab ham aap virodhi khaemae mae daal diyae jaayegae

परिवार कि बात सबसे ज्यादा करते है जो
ब्लोगिंग को खेमो मे बाँटते हैं वो

masijeevi ने कहा…

चलिए माने लेते हैं कि एकाध दिन चूक गए होंगे, नहीं पढ़ पाए कि आप किस बारे में बात कर रहे हैं पर दोस्‍त आप ही एकाध लिंक लगा देते तो हम भी अद्यतन रह पाते। अब तो ऐसे पढ़ रह हैं मानो किसी और दुनिय के बारे में बात है। किसने कहा कब कहा क्‍यों कहा ??

संजय बेंगाणी ने कहा…

मैं एक लम्बे काल से चिट्ठाकारी से जुड़ा हुआ हूँ, मुझे नहीं लगा कि यहाँ कोई परिवारवाद पनप रहा है. या खैमेबन्दी होती है. विवाद जरूर होते रहे है.

बाकि सब दृष्टी पर निर्भर करता है.

ajay kumar jha ने कहा…

mujhe ye to kabhi nahin laga ki parivaarvaad chal raha hai, albatta vaad vivaad khoob chaltaa hai, lekh achha laga,likhte rahein.

अल्पना वर्मा ने कहा…

Bilkul sahi likha =parivaarwaad ka virodh karna chaheeye aur blog jagat mein is ko panPaney nahin dena chaheeye..

khemebaji to abhi tak dikhi nahin yahan--

magar -
phir bhi yah to tay hai ki sabhi apni ruchi ke anusaar padhtey hain aur isee tarah ruchiyon ki hisab se shayad kahin na kahin pathak janon ka aur [bloggers ka bhi] vergikaran hone laga hai--

ummed Singh Baid "saadahak " ने कहा…

भारत की यह भाविभूमि, कैसे करें विरोध.
परिवार पर चल रहा, अब दुनियाँ में शोध.
इस दुनियाँ में शोध,अमरता का यह मन्त्र है.
ल्से तोङने जुटा हुआ, इन्डिया का तन्त्र है.
कह साधक कवि, परिवार है रीढ भारत की.
कैसे करें विरोध, भाव-भूमि है यह भारत की.

डॉ .अनुराग ने कहा…

जो अच्छा लगे उसे पढो...बाकी सब ..कहानी है

PN Subramanian ने कहा…

हम स्वंतंत्र हैं. अंतरजाल किसी की बपौती नहीं है.
http://mallar.wordpress.com

eSwami ने कहा…

मुझे लगता है की आपका इशारा शास्त्रीजी के चिट्ठे की तरफ़ है!
आप उनका चिट्ठा फ़िर पढें, उन्होंने परिवार शब्द का प्रयोग चिट्ठाकारों की भौगोलिक दूरियों के बावजूद उनमें पनपे अपनत्व को रेखांकित करने के लिये किया है. वे इस अपनत्व के महत्व की तरफ़ इशारा कर के कह रहे हैं की विचारों की भिन्नता के बावजूद आप अपनत्व रख सकते हैं आपसी सम्मान रख सकते हैं जैसा की किसी बडे परिवार में होता है!

वैसे ये तो समझ में आया की आप पूरी बात समझे बिना विरोध किये हैं, तो दद्दा, आप विरोध करने वाले खेमें के हैं? ये मान लें? या आप प्रेम से दद्दा कहे जाने के भी विरोधी हैं? :)

paraag ने कहा…

ब्लाग एक व्यक्तिगत अभिव्यक्ति है, सामूहिक नहीं इसका प्रादुर्भाव ही अभिव्यक्ति पर सामूहिक कब्जे से छुटकारा पाने के लिये हुआ है इसे खेमे में बांधना या खेमेबन्दी करना सिर्फ मूर्खता ही है
कुछ लोग जबर्दस्ती रास्ता दिखाने वाले बनना शुरू कर देते हैं जानबूझकर भड़काऊ शीर्षक रखते हैं कि लोग वहां जाय मैं एसवामी के कथन से कतई सहमत नहीं हुं कि आपने इसका बिना समझे विरोध किया है डाक्टर अनुराग ने सिर्फ एक लाइन में निचोड़ दे दिया है कि "जो अच्छा लगे उसे पढो...बाकी सब ..कहानी है"

"अभिव्यक्ति के मंच पर हम-आप, हमारा-तुम्हारा और मेरा-तेरा जैसे किसी शब्द की कोई जगह नहीं होती है"

ab inconvenienti ने कहा…

ई-स्वामी ठीक कह रहे हैं. पढ़ना आना ही काफी नहीं है, कही गई बात का सही अर्थ निकालने की योग्यता भी होनी चाहिए. पर सोचना समझना तो पाप है 'विरोधियों' के लिए, हर बात में बिना आगे पीछे सोचे गलती निकालने की जन्मजात आदत जो ठहरी!

Shastri ने कहा…

प्रिय प्रभात, यदि इशारा मेरे आलेख http://sarathi.info/archives/1654 की ओर है तो आपने मेरा मंतव्य नहीं समझा है. यदि इशारा किसी और आलेख की ओर है तो कुछ कहा नहीं जा सकता है.

आगे से यदि आलोच्य लेख की कडी दे दें तो सुविधा हो जायगी.

मेरे लेख का मतलब यह था कि यहां विचारों की विविधता (खेमे) हैं लेकिन आपसी झगडा (खेमेबाजी) नहीं है. यही आप भी चाहते है.

सस्नेह -- शास्त्री

Nitish Raj ने कहा…

खेमे हैं या नहीं ये तो दूर की बात है डॉ अनुराग की बात को गांठ बांध कर आगे बढ़ें। ये सभी के लिए है।

खरी-खरी ने कहा…

आपने सही लिखा है। शास्त्री जी की बात का बुरा न माने। पहले हम लोग उन्हे 'मसाला शास्त्री' कहते थे आजकल वे 'सीसनल शास्त्री' कहलाते है। साल मे चार महिने चिठ्ठाकारी करते है जमकर और विवादास्पद लेख लिखते है ताकि भीड खिचे, फिर गायब हो जाते है। भीड खिचने के लिये वे अश्लीलता से भी परहेज नही करते (सन्दर्भ: फुरसतिया)। रचना जी ने उन्हे कहा है कि निजी साइट बनाकर चिठ्ठाकारी न करे। पर वे लगे हुये है। वे उपदेशक (सन्दर्भ: मासीजीवी) है ये सब जानते है। उपदेश एक तरफा होता है। पुराने ब्लागरो को इन सीसनल शास्त्री की आदत हो गयी है। आपको भी हो जायेगी। :)