मेरा ब्लाग से परिचय अपने घनश्याम जी (घन्नू झारखंडी जी) www.jharkhandighanshyam.blogspot.com के माध्यम से हुआ। नेट, जो दो-तीन साल पहले तक अंगरेजी के जानकारों तक ही सीमित था, उसकी हिन्दी में उपलब्धता को देखकर एक सुकून और आनंद की लहर दौड़ पड़ी थी। ब्लाग बनाने के चक्कर में न जाने कितने घंटे गुजारे। अखबार में काम करता हूं। डेस्क पर हूं। लिखने से ज्यादा लिखी चीजों को छांटने-काटने का काम करता हूं। ब्लॉग को देखकर लगा कि कम से कम इसमें अपने विचारों और मन की उड़ान को जगह मिल जायेगी। मिली भी, अब पांच महीने होने को हैं, लगातार लिख रहा हूं।
लेकिन इस ब्लागिंग की दुनिया में वैसा कोई मापदंड नहीं है, जिससे किसी रचना की श्रेष्ठता मापी जा सके। अगर कहें कि टिप्पणी को मापदंड माना जाये, तो वैसे में जिस ब्लॉग से सबसे ज्यादा लोगों का भावनात्मक लगाव होता है, उन्हें ज्यादा टिप्पणियां मिलती हैं। ऐसे में भावना के जुड़ जाने से ये मापदंड खत्म हो जाता है। यहां मेरे हिसाब से प्रयास लोगों को बेहतर लेखन की ओर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करने की है। लिखने के साथ-साथ ज्यादा पढ़ने, जानने और खुद को बेहतर करने की कोशिश हो।
ऐसा न हो कि अगर पाकिस्तान के खिलाफ आग उगलने की बात हो, तो आप-हम उन सारी गंदी चीजों की उलटी करें, जो हमारी सामान्य जिंदगी में नहीं होना चाहिए। ब्लॉग को एक स्वस्थ मंच बनाने की दिशा में पहल होनी चाहिए। कुछ ऐसा हो, जिसका हम सब पालन करें।
जैसे- किसी प्रकार की अनचाही और गलत बातों को टिप्पणी में न डालें
दूसरों के प्रति संबोधन में उनकी इज्जत का ख्याल करें
दूसरों के व्यक्तिगत जीवन का उल्लेख करने से पहले उनकी सहमति ले लें।
दूसरे लोगों को अच्छा और बेहतर लिखने के लिए प्रोत्साहित करें
खुद को बेहतर बनाने की कोशिश हो, लगातार
हमारा मकसद किसी व्यक्ति विकास केंद्र की स्थापना का नहीं है, बल्कि अपनी सोच को ऐसी धार देने की है, जिससे हिन्दी ब्लागिंग पर भी श्रेष्ठता का मुहर लग सके। ज्यादातर बातचीत में महसूस होता है कि ब्लाग जगत के बारे में लोगों में अच्छी राय नहीं है। लोगों का कहना है कि ब्लाग जगत आक्षेप और निंदा की जगह हो गयी है। लेकिन अगर हम प्रयास करें, तो इसे सुधार सकते हैं। पिछली एक पोस्ट में भी मैंने इन बातों का उल्लेख किया था।
ब्लाग को मन की डायरी है। इसमें हमारा पूरा स्वरूप झलकता है। इसलिए इस आईने को कम से कम साफ-सुथरा रखना हमारा कतॆव्य है। जिससे जो भी एक बार यहां आये, यहां का होकर रह जाये।