कुछ दिनों पहले हमने पोस्ट डाली थी परिवारवाद का विरोध हो और एक-दो पोस्ट प्रतिक्रियावादी होकर लिखी। लेकिन उसके बाद अपने कुछ मित्रों को भी वही कहते हुए पाया, जिनके बारे में मैंने पोस्ट में जिक्र किया। उन साथियों का कहना था कि ब्लॉग जगत निंदा, कटाक्ष और गैर-जरूरी बहस का मंच बन गया है। लेकिन इन सबके अलग सोचता हूं कि क्या प्रतिक्रियावादी होकर हम सब इन चीजों को सुधार सकते हैं।
बताते हैं कि पहले कुछ ही ब्लाग थे और आज उनकी तुलना में कई गुना ज्यादा हैं। खुशी होती है। यहां यह कहना महत्वपूणॆ होगा कि इसी ब्लॉग जगत में ऐसे विद्वत जन भी हैं, जो आपको अपनी बड़प्पन का बिना कुछ कहे एहसास करा जायेंगे। याद होगा, शुरुआत में समीरलाल जी के टिप्पणी देने के अनुरोध के मुद्दे पर काफी विवाद नजर आया था। लेकिन समीरलाल जी ने अपनी लेखनी में कभी इन चीजों का एहसास नहीं होने दिया। फिर हाल के दिनों में ज्ञानदत्त पांडे जी से भी परिचय ब्लॉग के जरिये हुआ। इनकी टिप्पणियों और सही-सटीक बातों से जैसा मागॆदशॆन मिलता है, उससे तो ऐसा ही लगता है कि प्रतिक्रियावादी होना व्यथॆ है। मुझे लगता है (व्यक्तिगत रूप से) कि इन्होंने ब्लॉग जगत को अपनी लेखनी से एक अलग सोच दी है। अब कोई इन्हें ब्लॉग जगत का महानायक कहे या नायक।
हमारा मानना है कि जब चारों ओर गंदगी हो, तो गंदगी की जगह साफ जगह को तरजीह देने की कोशिश होनी चाहिए। प्रतिक्रियावादी होकर हम किसी का विचार नहीं बदल पायेंगे। हां, ये जरूर होगा कि हमारी पोस्ट काफी पढ़ी जायेगी। और जैसा कि माननीय एनोनिमस भाई साहब करते आये हैं, उनका एक अजब-गजब कमेंट जरूर आयेगा।
माननीय एनोनिमस भाई ने मुहल्ला ब्लॉग में गांव रहने लायक नहीं बचा... और मीडिया?" शीषॆकवाली पोस्ट में कुछ ऐसी ही टिप्पणी की,
हे हे...वाह बेटा... 13 साल तक तो मलाई चाट रिये थे और एनडीटीवी के हर कर्म का गुणगान कर रिये थे... अब नौकरी छूटी तब कमियां याद आयी... वाह रे भोथरी पत्रकारिता के पैने शहसवार :) जब तक पैंसो कि थैली मिली, जबान पर दही जम रिया था इनके... अब बोटी नहीं मिलती तो खोटी-खोटी बक रिये हैं...
हा हा सही बोले पंगेबाज भैये ...
जाहिर है विवाद व्यथॆ का रहेगा। जिसकी अपनी जिद होगी, वह वैसा ही रहेगा। हमारे-आपके सोचने से कुछ होगा भी नहीं। इसमें सही रास्ता यही होगा, जैसा हमारे वरिष्ठ ब्लॉगर साथी (एनोनिमस भाई साहब नहीं) कहते रहते हैं-जो पसंद आये उसे पढ़ो, अच्छा लिखो, बाकी सब कहानी है।
ज्यादा लफड़ा या झंझट में पड़ने की बजाय हम एक-दूसरे को अच्छा पोस्ट और लेख लिखने के लिए प्रोत्साहित करें, ये जरूरी है। क्योंकि सहयोग से ही प्रेम भावना बढ़ती है और उससे ही समाज का विकास होता है। ब्लॉगरों में कुछ अधिकारी होगा, कोई व्यवसायी, तो कोई पत्रकार। सबकी अपनी विशेष शैली और अनुभव होंगे। अगर उनके अनुभवों से हम कुछ सीखें या सीखने की कोशिश करें, तो उससे हमारे व्यक्तित्व का विकास ही होगा। अब ज्यादा क्या लिखना, बस भिड़े रहना है,
वो जुमला याद है ना-
लगे रहो इंडिया