बुधवार, 10 दिसंबर 2008

एक किनारे ज्ञानदत्त जी, समीरजी......और दूसरे किनारे हैं महान एनोनिमस जी

कुछ दिनों पहले हमने पोस्ट डाली थी परिवारवाद का विरोध हो और एक-दो पोस्ट प्रतिक्रियावादी होकर लिखी। लेकिन उसके बाद अपने कुछ मित्रों को भी वही कहते हुए पाया, जिनके बारे में मैंने पोस्ट में जिक्र किया। उन साथियों का कहना था कि ब्लॉग जगत निंदा, कटाक्ष और गैर-जरूरी बहस का मंच बन गया है। लेकिन इन सबके अलग सोचता हूं कि क्या प्रतिक्रियावादी होकर हम सब इन चीजों को सुधार सकते हैं।

बताते हैं कि पहले कुछ ही ब्लाग थे और आज उनकी तुलना में कई गुना ज्यादा हैं। खुशी होती है। यहां यह कहना महत्वपूणॆ होगा कि इसी ब्लॉग जगत में ऐसे विद्वत जन भी हैं, जो आपको अपनी बड़प्पन का बिना कुछ कहे एहसास करा जायेंगे। याद होगा, शुरुआत में समीरलाल जी के टिप्पणी देने के अनुरोध के मुद्दे पर काफी विवाद नजर आया था। लेकिन समीरलाल जी ने अपनी लेखनी में कभी इन चीजों का एहसास नहीं होने दिया। फिर हाल के दिनों में ज्ञानदत्त पांडे जी से भी परिचय ब्लॉग के जरिये हुआ। इनकी टिप्पणियों और सही-सटीक बातों से जैसा मागॆदशॆन मिलता है, उससे तो ऐसा ही लगता है कि प्रतिक्रियावादी होना व्यथॆ है। मुझे लगता है (व्यक्तिगत रूप से) कि इन्होंने ब्लॉग जगत को अपनी लेखनी से एक अलग सोच दी है। अब कोई इन्हें ब्लॉग जगत का महानायक कहे या नायक।

हमारा मानना है कि जब चारों ओर गंदगी हो, तो गंदगी की जगह साफ जगह को तरजीह देने की कोशिश होनी चाहिए। प्रतिक्रियावादी होकर हम किसी का विचार नहीं बदल पायेंगे। हां, ये जरूर होगा कि हमारी पोस्ट काफी पढ़ी जायेगी। और जैसा कि माननीय एनोनिमस भाई साहब करते आये हैं, उनका एक अजब-गजब कमेंट जरूर आयेगा।

माननीय एनोनिमस भाई ने मुहल्ला ब्लॉग में गांव रहने लायक नहीं बचा... और मीडिया?" शीषॆकवाली पोस्ट में कुछ ऐसी ही टिप्पणी की,

हे हे...वाह बेटा... 13 साल तक तो मलाई चाट रिये थे और एनडीटीवी के हर कर्म का गुणगान कर रिये थे... अब नौकरी छूटी तब कमियां याद आयी... वाह रे भोथरी पत्रकारिता के पैने शहसवार :) जब तक पैंसो कि थैली मिली, जबान पर दही जम रिया था इनके... अब बोटी नहीं मिलती तो खोटी-खोटी बक रिये हैं...
हा हा सही बोले पंगेबाज भैये ...


जाहिर है विवाद व्यथॆ का रहेगा। जिसकी अपनी जिद होगी, वह वैसा ही रहेगा। हमारे-आपके सोचने से कुछ होगा भी नहीं। इसमें सही रास्ता यही होगा, जैसा हमारे वरिष्ठ ब्लॉगर साथी (एनोनिमस भाई साहब नहीं) कहते रहते हैं-जो पसंद आये उसे पढ़ो, अच्छा लिखो, बाकी सब कहानी है।

ज्यादा लफड़ा या झंझट में पड़ने की बजाय हम एक-दूसरे को अच्छा पोस्ट और लेख लिखने के लिए प्रोत्साहित करें, ये जरूरी है। क्योंकि सहयोग से ही प्रेम भावना बढ़ती है और उससे ही समाज का विकास होता है। ब्लॉगरों में कुछ अधिकारी होगा, कोई व्यवसायी, तो कोई पत्रकार। सबकी अपनी विशेष शैली और अनुभव होंगे। अगर उनके अनुभवों से हम कुछ सीखें या सीखने की कोशिश करें, तो उससे हमारे व्यक्तित्व का विकास ही होगा। अब ज्यादा क्या लिखना, बस भिड़े रहना है,
वो जुमला याद है ना-

लगे रहो इंडिया

12 टिप्‍पणियां:

Mired Mirage ने कहा…

जैसे संसार में सब तरह के लोग हैं , कोई आपको पसन्द आते हैं, कोई नहीं और कुछ का होना या न होना आपके जीवन पर कोई प्रभाव नहीं डालता ऐसा ही यहाँ भी है । सबकी अपनी सार्थकता है । यदि आपको सब अच्छे लगेंगे तो अच्छे का क्या महत्व रह जाएगा ? यहाँ सबको अपने लिए पाठक या लेखक मिल जाते हैं ।
घुघूती बासूती

प्रकाश बादल ने कहा…

likho khoob pratikriyaa jaisi bhee ho koi baat nahin . achhii pratikriya to swagat karo buri pratikriya to bhee swagat. sab kaa nazariya alag alag par main ye maanta hoon ki achha likhane par nazariye ban jaate hain.

खरी-खरी ने कहा…

घुघुती जी सही कह रही है। आप कभी ज्ञान दत्त जी के बडप्पन पर भी लिखियेगा। उन्हे मेरी टिप्पणी प्सन्द नही आयी फिर भी आदरपूर्वक उसे शामिल किया और फिर उस पर एक पोस्ट भी बनायी। ऐसा अनोखा बडा दिल आपको किसी और ब्लागर के पास शायद ही मिले। इसी कारण वे आज हम सब के आदरणीय है। भगवान उन्हे दुखो से मुक्ति दिलाये।

समीर भाई ने भी बेनामियो को कभी बुरे से नही लिया। घुघुती बासूती, घोस्ट बस्टर, खरी-खरी, स्मार्ट इंडियन, माँ भवानी, पंगेबाज, एब कंवीनींटली, सच, स्वप्नदर्शी, ताऊ सहित बेनामियो की छोटी सी जमात है इस ब्लाग दुनिया मे। हम कडवा कहते है पर सबके भले के लिये। इसलिये हमे सहा जाता है, बिगडे बच्चो की तरह। हम आपस मे बहुतो को असली चेहरे से जानते है। आपको आशचर्य होगा कि बेनामियो की इस जमात मे खुद ज्ञान दत्त और समीर लाल भी शामिल है। जी, ऊपर लिखे नाम मे उनके रुप भी शामिल है। चौक गये न। अभी राज खोलने का समय नही है।

प्रकाश जी, आपसे झारखंड पर कुछ सशक्त लेखो की प्रतीक्षा है।

Vidhu ने कहा…

kyaa hamaari post par aayeng...sahi likhaa hai aapne,

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

आज तो "खरी -खरी जी " ने
काफी रहस्यमय बातोँ की तरफ
इशारा किया है
हम तो हो सके उतने BLOGS पढते हैँ और अब बारी बारी सभी का परिचय भी
"विश्वा " पत्रिका मेँ देने लगे हैँ
(विश्वा अँतराष्ट्रीय हिन्दी समिती द्वारा अमरीका मेँ कई बरसोँ से छप रही पत्रिका है )

स स्नेह,
- लावण्या

संगीता पुरी ने कहा…

प्रतिक्रियावादी बनने से कोई फायदा तो है नहीं। ज्‍योतिष जैसे विवादास्‍पद विषय पर पूरा जीवन समर्पित करने के बाद इसकी कुछ सार्थकता को देखते हुए ही तो मैने इसपर लेखन आरंभ किया है। प्रशंसा के साथ ही साथ व्‍यंग्‍य की भी बरसात हो रही है। पर अपना काम तो मुझे छोडना नहीं है। मुझे उस समय तक इंतजार करना होगा , जबतक कि समाज में ज्‍योतिष के वैज्ञानिक स्‍वरूप को सामने लाकर सबकी बोलती न बंद कर दूं।

Anil Pusadkar ने कहा…

आप तो बस लिखते रहिये धीरे-धीरे आपको सच्चे और सुधी पाठक मिलते चले जायेंगे जिनकी प्रतिक्रिया आपको अच्छी ही लगेगी चाहे वो आपके खिलाफ़ क्यो न हो।एक रिश्ता सा बनता चला जाता है जो आज की दुनिया मे बड़ी मुश्किल से नज़र आता है।

Upadhyayjee ने कहा…

lekin blog me yahi to fayda hai ki both way communication ho. Kewal khush karane waali hi tippadi naa ho. critics ki bhi jaroorat hai. Haan bhasha par control honi chahiye.

मिहिरभोज ने कहा…

बात कुछ हजम नहीं हुई...क्या जो बात न जैचे उस पर असहमति जरूरी नहीं है

Suresh Chiplunkar ने कहा…

मिहिरभोज से सहमत, जब तक गाली-गलौज या व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं हो, तब तक आलोचनात्मक टिप्पणी या गर्मागर्म बहस में कोई हर्ज नहीं है… कुछ को मेरे विचार पसन्द आयेंगे, कुछ को नहीं, यदि तारीफ़ पाना है तो आलोचना झेलना भी सीखना ही होगा मुझे…

नीरज गोस्वामी ने कहा…

Gyan bhaiiya aur Sameer ji mahan bloggers hain...imke jaisa doosra milna mushkil hai...sameer ji se to ek baar ,
neeraj mila hoon aur gyan ji se milne ki tammanna hai...bahut vaade karte hain lekin khopoli aate nahin jabki unki rel gaadi yahan tak aati hai....
neeraj

Udan Tashtari ने कहा…

आपने अपनी सोच, अपना पक्ष, अपनी विचारधारा बेबाकी से रखी, अच्छा लगा. बाकी तो सब शक सुबाह चलता रहता है..सबके अपने अनेक मत हैं..बस, अपना बनाये रहें और बिंदास लिखते रहें. शुभकामनाऐं.